चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला
तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला
हज़ारों मील लम्बे रास्ते तुझको बुलाते
यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते
है कौन सा वो इंसान यहाँ पे जिस ने दुख ना झेला
चल अकेला ...
तेरा कोई साथ न दे तो तू खुद से प्रीत जोड़ ले
बिछौना धरती को करके अरे आकाश ओढ़ ले
पूरा खेल अभी जीवन का तूने कहाँ है खेला
चल अकेला ...
बुधवार, 1 अगस्त 2007
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2 टिप्पणियां:
आपकी ये महान कविता बहुत ही बढ़िया लगी। इसी तरह लिखते रहें। चल अकेला जैसी शानदार कविता को आप छपवाते क्यों नहीं हैं
आदरणीय श्री प्रमोद जी,
आपकी एक कविता और कहीं मैने पढ़ी है, चलो दिलदार चलो चांद के पार चलो...हम भी तैयार चलो..आप कृपया इसे भी अपने ब्लाग में डाल कर देश के भोले पाठकों का भला करें। इसके अलावा आपने शायद जिंदगी एक सफर है सुहाना के बारे में भी अपनी पांडुलिपी किसी को दिखाई थी...उसका भी प्रकाशन करवा कर पाठकों का भला करें।
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